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KDMC की नाकामी: 12 साल में नहीं लागू हुआ फेरीवाला कानून, अब वसूली के लिए निजी एजेंट की तलाश।

illegal hawkers creating chaos and traffic jam.
​कल्याण-डोंबिवली / विनोद तिवारी 

कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) क्षेत्र में ट्रैफिक और अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहे करदाताओं के लिए एक चौंकाने वाली खबर है। एक तरफ जहां प्रशासन पिछले 12 वर्षों से ‘फेरीवाला नीति’ (The Street Vendors Act, 2014) को लागू करने में पूरी तरह विफल रहा है, वहीं दूसरी तरफ अब बाजार शुल्क (Daily Bazar Fee) वसूलने की जिम्मेदारी निजी ठेकेदारों को सौंपने की तैयारी की जा रही है।

​तीन साल का अनुबंध, करोड़ों की वसूली का लक्ष्य:

​महानगरपालिका ने वर्ष 2026-27 से 2028-29 तक, यानी कुल तीन साल की अवधि के लिए निविदा (Tender) जारी की है। इसके तहत निजी एजेंट शहर की मुख्य सड़कों, स्टेशन परिसर और फुटपाथों पर बैठने वाले फेरीवालों, हाथगाड़ी वालों और खुदरा विक्रेताओं से रोजाना शुल्क वसूलेंगे।

​प्रशासन द्वारा निर्धारित दरें:

​फेरीवाले: ₹50/- प्रतिदिन
​टोकरी वाले: ₹10/- प्रतिदिन
​टेम्पो/स्टाल/टपरी/दुकान के सामने की जगह: ₹100/- प्रतिदिन

​सड़कें जाम, फुटपाथ गायब; करदाता बेहाल:

​शहर की हकीकत यह है कि मुख्य सड़कें और फुटपाथ अवैध साप्ताहिक बाजारों और फेरीवालों के कब्जे में हैं। राहगीरों के लिए चलने की जगह नहीं बची है और वाहन चालक घंटों ट्रैफिक में फंसने को मजबूर हैं। जानकारों का मानना है कि अपने ‘कामचोर और भ्रष्ट’ कर्मचारियों पर लगाम कसने में नाकाम रहा प्रशासन अब ठेकेदारी प्रथा के जरिए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है।

​12 साल से ‘कचरे के डिब्बे’ में कानून:

​केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में ‘द स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट’ बनाया था, ताकि फेरीवालों का पंजीकरण हो और उनके लिए जोन निर्धारित किए जाएं। KDMC ने 12 साल बीत जाने के बाद भी इसे अमलीजामा नहीं पहनाया है। कानून लागू न होने से न केवल शहर की व्यवस्था बिगड़ रही है, बल्कि उन पुराने फेरीवालों के साथ भी अन्याय हो रहा है जो नियमों के दायरे में रहकर व्यापार करना चाहते हैं।

​सवाल यह उठता है कि क्या केवल वसूली के लिए निजी एजेंट नियुक्त करने से शहर को ट्रैफिक और अतिक्रमण से मुक्ति मिलेगी, या यह केवल भ्रष्टाचार को नया मोड़ देने की कोशिश है?

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